आज का तंज
सरकार का E20, जनता का 'Why 20?
E20 पेट्रोल को लेकर देश में बवाल लगातार बढता जा रहा है। बीते दिनों में जिस तरह से देश की राजधानी की सड़कों पर विरोधमार्च देख गया उससे यही लगता है कि आने वाले दिनों में एक बार फिर बड़ा आंदोलन हो सकता है।
E20 पेट्रोल को लेकर देश में बवाल लगातार बढता जा रहा है। बीते दिनों में जिस तरह से देश की राजधानी की सड़कों पर विरोधमार्च देख गया उससे यही लगता है कि आने वाले दिनों में एक बार फिर बड़ा आंदोलन हो सकता है। बीते दिनों आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आवास की ओर मार्च निकाला। केजरीवाल करीब 100 समर्थकों के साथ 2.33 लाख से ज्यादा लोगों के हस्ताक्षर वाली याचिकाएं लेकर प्रधानमंत्री के आवास की तरफ बड़े लेकिन बीच में ही पुलिस ने उन्हे रोक लिया और केजरीवाल वहीं धरने पर बैठ गये। उधर सोशल मीडिया पर “मोदी-ट्रंप गठबंधन” के हैशटैग उछल पड़े। E20 ईंधन अब सिर्फ फ्यूल नहीं, राजनीतिक हथियार बन चुका है। सरकार इसे राष्ट्रीय गौरव बता रही है, कच्चा तेल बच गया, किसान खुश, कार्बन कम, तो विपक्ष इसे जनता के वाहनों पर थोपा गया जहर करार दे रहा है।
भारत सरकार के भारी उद्योग मंत्रालय के अंतर्गत आने वाली प्रमुख ऑटोमोबाइल परीक्षण एवं अनुसंधान संस्था (ARAI) के टेस्ट, ऑटो कंपनियों के आश्वासन और “कोई इंजन नहीं फटा” वाले बयान बार-बार दोहराए जा रहे हैं। माइलेज में 2-6 प्रतिशत की गिरावट को “स्वाभाविक” बताकर टाल दिया गया है। सवाल यह है कि जब 2023 से पहले बनी करोड़ों गाड़ियों को E20 के लिए डिजाइन नहीं किया गया था, तो उन्हें बिना विकल्प दिए थोपना “दूरदर्शिता” है या “हठधर्मिता”?
जनता की इच्छा साफ है-विकल्प चाहिए। शुद्ध पेट्रोल भी उपलब्ध रहे, E20 सस्ता हो और कीमतें नीचे आएं। लेकिन सरकार का जवाब है कि विकल्प देने से नीति का मकसद ही खत्म हो जाएगा। यानी ऊर्जा सुरक्षा इतनी नाजुक है कि उपभोक्ता की पसंद को कुर्बान करना पड़ रहा है। विपक्ष इसे राजनीतिक मौका समझकर सड़क पर उतर आया है, जबकि सत्ता पक्ष इसे “भ्रम फैलाना” बताकर खारिज कर रहा है। दोनों तरफ से वही पुरानी स्क्रिप्ट चल रही है-एक तरफ राष्ट्रहित का ढोल, दूसरी तरफ जनता की पीड़ा का रोना। बीच में फंसा हुआ आम आदमी अपनी गाड़ी में इथेनॉल भरवा रहा है और सोच रहा है कि आखिर ये कौन सा विकास है जिसमें पेट्रोल की जगह शराब मिल रही है और माइलेज की जगह सिरदर्द।
असली पेच यहीं फंसा है। नीति अच्छी हो सकती है, लक्ष्य नेक हो सकते हैं, लेकिन जब उसे लागू करने का तरीका जबरदस्ती का हो और विकल्प न दिए जाएं, तो विरोध स्वाभाविक है। सरकार अगर सच में इतनी आश्वस्त है तो रिपोर्ट सार्वजनिक कर दे, पुरानी गाड़ियों के लिए संक्रमण काल दे और पंपों पर दोनों फ्यूल उपलब्ध कराए। वरना सिर्फ “देशहित” का नारा दोहराने से न तो इंजन ठीक होंगे और न जनता का गुस्सा।
