शनिवार, 5 सितंबर 2026
विश्लेषण

अमीर के लिए सेटलमेंट, आम आदमी के लिए वसूली एजेंट : देश में कर्ज माफी की दोहरी व्यवस्था

अमीर के लिए सेटलमेंट, आम आदमी  के लिए वसूली एजेंट : देश में कर्ज माफी की दोहरी व्यवस्था

नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT) ने हाल ही में एस्सेल ग्रुप और ज़ी एंटरटेनमेंट के संस्थापक डॉ. सुभाष चंद्रा से जुड़े व्यक्तिगत गारंटर दिवाला मामले में एक रेजोल्यूशन प्लान को मंजूरी दी है। मीडिया में इसे "22,006 करोड़ रूपए के कर्ज के बदले सिर्फ 6.5 करोड़ रुपए का सेटलमेंट" के रूप में रिपोर्ट किया गया,

ADVERTISEMENT / विज्ञापन
नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT) ने हाल ही में एस्सेल ग्रुप और ज़ी एंटरटेनमेंट के संस्थापक डॉ. सुभाष चंद्रा से जुड़े व्यक्तिगत गारंटर दिवाला मामले में एक रेजोल्यूशन प्लान को मंजूरी दी है। मीडिया में इसे "22,006 करोड़ रूपए के कर्ज के बदले सिर्फ 6.5 करोड़ रुपए का सेटलमेंट" के रूप में रिपोर्ट किया गया, यानी करीब 99.97 फीसदी का "हेयरकट"। एलआईसी हाउसिंग फाइनेंस, एचडीएफसी बैंक, एक्सिस बैंक, केनरा बैंक, आरबीएल बैंक और यूनियन बैंक जैसे कई कर्जदाताओं ने इस योजना का विरोध भी किया, लेकिन क्रेडिटर कमेटी के 80.81 फीसदी बहुमत के आधार पर NCLT ने इसे मंजूरी दे दी। इसके बाद सरकार और खुद सुभाष चंद्रा की ओर से स्पष्टीकरण भी आया — कि 22,006 करोड़ रुपए का आंकड़ा वह मूल दावा राशि है जो वर्ष 2022 में दर्ज हुई थी, न कि आज की वास्तविक बकाया देनदारी। चंद्रा के अनुसार उनकी मौजूदा व्यक्तिगत गारंटी देनदारी करीब 3,992 करोड़ रुपए है, जिसमें से बड़ा हिस्सा पहले ही चुकाया जा चुका है। यह मामला किसी कंपनी का कर्ज माफ होना नहीं, बल्कि एक व्यक्तिगत गारंटर की दिवाला प्रक्रिया (Personal Guarantor Insolvency) है — जो कॉर्पोरेट दिवाला प्रक्रिया से अलग होती है। इस स्पष्टीकरण के बावजूद यह घटना एक बड़े और वाजिब सवाल को फिर सतह पर ले आई है: आम आदमी और बड़े कर्जदार के लिए वसूली के नियम अलग क्यों दिखते हैं? एक आम व्यक्ति जब बैंक से होम लोन, पर्सनल लोन या क्रेडिट कार्ड बिल नहीं चुका पाता, तो प्रक्रिया आमतौर पर तेज़ और सख्त होती है: • कुछ किस्तें चूकते ही रिकवरी एजेंट फोन और घर पर आने लगते हैं। • लोन डिफॉल्ट होते ही सिबिल स्कोर खराब हो जाता है, जिससे भविष्य में कर्ज मिलना मुश्किल हो जाता है। • संपत्ति गिरवी हो तो सरफेसी एक्ट के तहत जब्ती और नीलामी की कार्रवाई शुरू हो जाती है। • बिजली या पानी का एक महीने का बिल बकाया होने पर कनेक्शन काटने की चेतावनी और कार्रवाई तुरंत होती है। • अदालत तक जाने की नौबत भी जल्दी आ जाती है, और आम कर्जदार के पास महंगे वकील और लंबी कानूनी लड़ाई लड़ने के संसाधन कम होते हैं। इसके उलट, बड़े कॉर्पोरेट कर्जदारों और उनके प्रमोटरों के मामलों में: • मामला अक्सर वर्षों तक NCLT, DRT, या बातचीत की मेज पर खिंचता है। • "वन-टाइम सेटलमेंट" या "हेयरकट" के जरिए मूल कर्ज के मुकाबले बेहद कम राशि में निपटारा हो जाता है। • कई मामलों में बकाया कर्ज को बैंक अपनी बैलेंस शीट से "राइट-ऑफ" (बट्टे खाते में डालना) कर देते हैं। यह बहस काले-सफेद जवाब वाली नहीं है। एक तरफ बैंकिंग और IBC व्यवस्था के अपने तकनीकी और आर्थिक तर्क हैं — राइट-ऑफ अकाउंटिंग प्रक्रिया हैं, इसका अर्थ कर्जदार की देनदारी माफ होना नहीं है; वसूली की कोशिशें अलग खाते में जारी रहती हैं। सरकार का तर्क है कि रेजोल्यूशन से रोज़गार बचता है- जब कंपनी बंद (लिक्विडेशन) होने की बजाय किसी नए मालिक के हाथ चलती रहती है, तो नौकरियां और उत्पादन बचता है और कॉर्पोरेट व निजी कर्जदार की प्रक्रियाएं कानूनन अलग हैं। दूसरी तरफ, आंकड़े यह भी दिखाते हैं कि पिछले एक दशक में बैंकों ने लाखों करोड़ रुपये के कर्ज बट्टे खाते में डाले हैं, जिनका बड़ा हिस्सा बड़े कॉर्पोरेट कर्जदारों से जुड़ा रहा है, जबकि आम कर्जदार के लिए छोटी सी चूक पर भी सख्त और तुरंत कार्रवाई होती है। तर्कों के बावजूद, आम आदमी के नज़रिए से विरोधाभास साफ है: • पैमाना अलग-अलग लगता है — बिजली का एक महीने का बिल बकाया होने पर कनेक्शन कट जाता है, लेकिन हज़ारों करोड़ के कर्ज के मामले वर्षों तक अदालतों में खिंचते हैं और अंत में एक छोटे प्रतिशत में निपट जाते हैं। • संसाधन और पहुंच की असमानता — बड़े कर्जदारों के पास महंगे वकील, वित्तीय सलाहकार और मोलभाव की ताकत होती है, जबकि आम कर्जदार अक्सर कानूनी और वित्तीय जानकारी के अभाव में जल्दी हार मान लेता है या रिकवरी एजेंटों के दबाव में आ जाता है। • पारदर्शिता की कमी — बैंक अक्सर बड़े राइट-ऑफ किए गए कर्जदारों के नाम सार्वजनिक नहीं करते, जबकि आम कर्जदार का डिफॉल्ट सिबिल स्कोर के जरिए स्थायी रूप से दर्ज हो जाता है और सार्वजनिक असर डालता है। • नतीजों में विषमता — आम कर्जदार के लिए एक चूक जीवनभर का वित्तीय बोझ बन सकती है, जबकि बड़े कर्जदार अक्सर एक कंपनी डुबाकर नई कंपनी शुरू कर लेते हैं। असली सवाल माफी देने या न देने का नहीं, बल्कि एकरूपता और पारदर्शिता का है — क्या नियम, समयसीमा और जवाबदेही सबके लिए समान रूप से लागू होते हैं, या पहुंच और पैसे की ताकत के हिसाब से बदल जाते हैं। जब तक बड़े कर्जदारों के निपटारे उतनी ही पारदर्शिता और तेज़ी से सार्वजनिक नहीं होते जितनी सख्ती आम आदमी पर बरती जाती है, तब तक यह असमानता की धारणा बनी रहेगी।
ADVERTISEMENT / विज्ञापन

📰 सम्बंधित लेख