आज का तंज
सड़क की भाषा ऑन स्क्रीन
आमतौर पर गालियों और अश्लील शब्दों का प्रयोग सड़क-छाप पुरुष संस्कृति से जुड़ा माना जाता था। लेकिन Genz आंदोलन में ऑन-स्क्रीन (खासकर वायरल वीडियो में) कम उम्र की लड़कियों द्वारा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ अत्यंत अमर्यादित और व्यक्तिगत गालियों का इस्तेमाल देखकर समाज स्तब्ध रह गया। एक युवा लड़की का वीडियो विशेष रूप से चर्चा में रहा, जिसमें आरोप है कि उन्होंने प्रधानमंत्री और उनकी दिवंगत माता के प्रति अत्यंत अभद्र भाषा का प्रयोग किया। बाद में उन्होंने माफी मांगी और कहा कि वे भीड़ के प्रभाव में आ गई थीं। यह विडंबना है कि महिलाएं खुद उस भाषा का इस्तेमाल कर रही हैं, जो लंबे समय से महिलाओं के सम्मान को चुनौती देती रही हैं।
यह दृश्य कई लोगों के लिए “सांस्कृतिक सदमा” साबित हुआ। गाली-गलौज को राजनीतिक विरोध का औजार बनाने की यह प्रवृत्ति नई नहीं है, लेकिन युवा महिलाओं द्वारा खुलेआम और कैमरे के सामने इसका इस्तेमाल परंपरागत भारतीय सामाजिक मानदंडों को चुनौती देता प्रतीत होता है।
दोनों तरफ के लोग इस पर तीखी बहस कर रहे हैं। एक पक्ष इसे संस्कृति का विनाश बता रहा है, दूसरा इसे आक्रोश की स्वाभाविक अभिव्यक्ति करार दे रहा है। दोनों ही आधे-अधूरे हैं। प्रधानमंत्री को व्यक्तिगत और अभद्र गाली देना किसी भी हाल में सही नहीं ठहराया जा सकता, लेकिन यह भी सच है कि राजनीति का स्तर इतना गिर चुका है कि नेताओं के प्रति सामान्य सम्मान भी बचाना मुश्किल हो गया है। जब सालों से नेता एक-दूसरे पर व्यक्तिगत हमले करते रहे, परिवारों को निशाना बनाते रहे और गाली-गलौज को ‘जुनून’ बताते रहे, तो युवा पीढ़ी से साफ-सुथरी भाषा की उम्मीद करना खुद एक तरह का ढोंग है।
अंततः राजनीतिक वर्ग को अपनी भाषा और व्यवहार में सुधार लाना होगा। युवाओं को भी समझना होगा कि मजबूत विरोध तर्क, संगठन और रचनात्मकता से आता है, गाली से नहीं। समाज को भी दो चरम सीमाओं (अंधभक्ति और अंधविरोध) से ऊपर उठकर मर्यादा और जवाबदेही दोनों की मांग करनी होगी।
