हमारे संविधान ने चुनाव
आयोग को तीन लोगों की टीम बनाया थाः एक मुख्य चुनाव आयुक्त और दो चुनाव आयुक्त। मुख्य
आयुक्त “बराबरी वालों में पहले“ माने गए, यानी बड़े नहीं, सिर्फ़ पहले। फ़ैसले सबकी सहमति या बहुमत से होने थे।
लेकिन इंडियन एक्सप्रेस
की पड़ताल के हवाले से जो बात सामने आई है, वह चिंता की है। ख़बर
है कि अक्टूबर 2025 से अगस्त 2026 के बीच दोनों चुनाव आयुक्तों ने 14 बार लिखित आपत्ति जताई। आरोप है कि आयोग के नाम से ऐसे पत्र और
आदेश निकले, जिन्हें आयोग ने मंज़ूर ही नहीं किया था।
और चार महीने तक आयोग की बैठक भी नहीं हुई। सवाल सीधा हैः जब बैठक नहीं हुई, तो फ़ैसले कौन ले रहा था?
अब मतदाता सूची की बात।
कानून कहता है कि सूची में नाम जोड़ने या हटाने का काम स्थानीय अधिकारी (ERO) करेंगे।
आयोग हमेशा कहता रहा कि इतने लोगों के हाथ से बनी सूची में गड़बड़ी आसान नहीं। पर आरोप
है कि ECI-Net नाम का सॉफ़्टवेयर आया और हज़ारों हाथ एक “लॉगिन“ में सिमट गए। कई राज्यों में यही अधिकारी
नाम जोड़-घटा नहीं पा रहे थे, और चाबी दिल्ली की एक टीम के पास थी।
गोवा का उदाहरण देखिए।
सुनवाई में अफ़सरों ने माना कि 97 लोग असली मतदाता हैं और उनके नाम सूची में
होने चाहिए। पर सॉफ़्टवेयर में नाम वापस जोड़ने का कोई विकल्प ही नहीं था। राज्य के मुख्य
निर्वाचन अधिकारी ने सात दिन में आठ ईमेल भेजे, जवाब नहीं आया। अंतिम
सूची में वे 97 लोग नहीं थे। यानी सही फ़ैसला भी हो गया, फिर भी वह लागू नहीं हो पाया। शायद ईमेल भी किसी “लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी“ में फँस गए हों।
फ़ॉर्म 6 का मामला भी अजीब है। यह वह फ़ॉर्म है जिससे नया वोटर बनता है।
आरोप है कि इसमें एक ज़रूरी सवाल जोड़ा गयाः आपका, या आपके माता-पिता/दादा-दादी
का नाम पिछली SIR सूची में था या नहीं? दोनों आयुक्तों के मुताबिक़
नियम बदले बिना ऐसा नहीं हो सकता। फिर भी 22 सितंबर तक यह सवाल फ़ॉर्म
में बना रहा। यहाँ तंत्र की एक अनोखी उपलब्धि हैः जनता को मतदाता बनने के लिए दस्तावेज़
दिखाने पड़ते हैं, और मतदाता सूची में लौटने के लिए सॉफ़्टवेयर
की इजाज़त लेनी पड़ती है।
पश्चिम बंगाल में सुप्रीम
कोर्ट के निर्देश पर न्यायिक अधिकारियों ने दस्तावेज़ जाँचकर 33 लाख नाम वापस जोड़े। बताया जाता है कि इनमें से 16 लाख मामलों में आयोग की ओर से अपील की गई। पर यह अपील किसने की, इसकी जानकारी दोनों आयुक्तों को भी नहीं थी। ऐसे में सवाल उठता
है कि आयोग की तरफ़ से बोलने वाला आख़रि कौन है?
एक जानकारी के अनुसार
बड़े अफ़सरों, मंत्रियों और मशहूर लोगों को “VIP मतदाता“
के रूप में चिह्नित करने
का मॉड्यूल बना है, ताकि उनके नाम ग़लती से न कटें। अगर यह सच
है, तो सवाल है कि आम मतदाता के नाम की चिंता
किसे है? यहाँ
“VIP मतदाता“ वाला मॉड्यूल समानता के
संविधान को श्रद्धांजलि देने जैसा प्रतीत होता हैं।
इसलिए आयोग को चाहिए कि
वह ECI-Net का स्वतंत्र ऑडिट कराए,
अपीलों का हिसाब दे, फ़ॉर्म 6 की वैधता बताए और बैठकों का रिकॉर्ड सार्वजनिक
करे।
चुनाव आयोग की सबसे बड़ी
ताक़त लोगों का भरोसा है। यह भरोसा बनने में दशकों लगते हैं, और सवालों का जवाब न मिले तो टूटने में देर नहीं लगती।
