GDP की लड़ाई आंकड़ों की, आम आदमी की
लड़ाई महीने के आखिर में बचने वाले पैसों की
देश की GDP 7.8 प्रतिशत
बढ़ी है। सरकार के लिए यह बड़ी उपलब्धि है और आंकड़े बताते हैं कि अर्थव्यवस्था मजबूत
रफ्तार से आगे बढ़ रही है। लेकिन इसी आंकड़े को लेकर पूर्व वित्त सचिव सुभाष चंद्र गर्ग
ने सवाल उठाते हुए करीब 2.6 प्रतिशत की वैकल्पिक गणना सामने रख दी है। सरकार ने इस
दावे को खारिज करते हुए कहा है कि 7.8 प्रतिशत का आंकड़ा नई GDP श्रृंखला और संशोधित आंकड़ों के आधार पर सही है।
लेकिन आम आदमी के लिए असली सवाल न 7.8 प्रतिशत है,
न 2.6 प्रतिशत। उसका सवाल इससे कहीं
ज्यादा सीधा है-मेरी जिंदगी में कितना सुधार आया?”
GDP बढ़ने का मतलब है कि देश में आर्थिक गतिविधियां बढ़ रही हैं। उत्पादन
बढ़ रहा है, सेवाओं का विस्तार
हो रहा है, निवेश हो रहा
है और बाजार में पैसा घूम रहा है। इस तिमाही में Manufacturing और Services जैसे क्षेत्रों ने अच्छा प्रदर्शन किया है और निवेश भी मजबूत रहा
है।
लेकिन इस पूरी तस्वीर का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा आम आदमी है।
अगर GDP 7.8 प्रतिशत
बढ़ रही है तो उसका असर केवल आंकड़ों में नहीं, बल्कि नौकरी, वेतन, किसान की आमदनी, मजदूर की दिहाड़ी, छोटे दुकानदार की बिक्री, घर की बचत और परिवार के खर्च में भी दिखाई देना चाहिए।
युवा के हाथ में रोजगार हो, कर्मचारी की वास्तविक आय बढ़े,
किसान को लागत निकालने के बाद बेहतर
आमदनी मिले, मजदूर की मजदूरी
बढ़े और छोटा दुकानदार ज्यादा बिक्री करे-तभी आम आदमी कहेगा कि अर्थव्यवस्था सचमुच आगे
बढ़ रही है।
इसी तरह अगर परिवार की आय बढ़ने के साथ शिक्षा,
इलाज,
मकान,
बिजली,
परिवहन और रोजमर्रा की चीजों का खर्च
भी बढ़ता जाए, तो कागज पर
ळक्च् की तेजी के बावजूद घर का बजट परेशान रह सकता है। जुलाई में खुदरा महंगाई
4.45 प्रतिशत और खाद्य महंगाई 5.52 प्रतिशत रही-इसलिए आम आदमी के लिए सिर्फ आय बढ़ना
पर्याप्त नहीं, आय और खर्च
के बीच का अंतर बढ़ना ज्यादा जरूरी है।
यही कारण है कि GDP को आम आदमी
की जिंदगी का पूरा पैमाना नहीं माना जा सकता। ळक्च् देश की अर्थव्यवस्था की सेहत बताती
है, लेकिन परिवार
की आर्थिक सेहत जानने के लिए यह देखना होगा कि महीने के अंत में कितना पैसा बच रहा
है।
अगर पांच साल पहले परिवार की आय 50 हजार रुपये थी और 5 हजार रुपये
बचते थे, लेकिन आज आय
60 हजार रुपये होने के बावजूद खर्च बढ़कर 58 हजार रुपये हो गया है,
तो आंकड़ों में आय बढ़ी जरूर है,
मगर परिवार की आर्थिक सुरक्षा कमजोर
हुई है।
इसलिए 7.8 प्रतिशत GDP अच्छी खबर
है, लेकिन इसकी
असली सफलता तभी मानी जाएगी जब उसका फायदा रोजगार से लेकर रसोई तक,
किसान से लेकर दुकानदार तक और वेतन
से लेकर बचत तक दिखाई दे।
GDP की लड़ाई आंकड़ों की है, लेकिन आम आदमी की लड़ाई महीने के आखिर में बचने वाले पैसों की है।
