शनिवार, 5 सितंबर 2026
आज का तंज

स्कूल ठीक करो... लेकिन मिड-डे मील पहले ठीक करो school

 स्कूल ठीक करो... लेकिन मिड-डे मील पहले ठीक करो school

देश भर में “स्कूल ठीक करो” आंदोलन जोर-शोर से चल रहा है। बच्चे सड़कों पर हैं। नारे गूंज रहे हैं.इमारत ठीक करो, शौचालय ठीक करो, शिक्षक ठीक करो, किताबें ठीक करो। सब ठीक करो। लेकिन गत दिनों कोटा राजस्थान के एक स्कूल से जो खबर आई है, उसने साफ बता दिया कि सबसे पहले “मिड-डे मील ठीक करो” वाला नारा भूल गए हम सब।

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देश भर में “स्कूल ठीक करो” आंदोलन जोर-शोर से चल रहा है। बच्चे सड़कों पर हैं। नारे गूंज रहे हैं.इमारत ठीक करो, शौचालय ठीक करो, शिक्षक ठीक करो, किताबें ठीक करो। सब ठीक करो। लेकिन गत दिनों कोटा राजस्थान के एक स्कूल से जो खबर आई है, उसने साफ बता दिया कि सबसे पहले “मिड-डे मील ठीक करो” वाला नारा भूल गए हम सब। कोटा जिले के पुनिया देवरी स्थित सरकारी स्कूल में सोमवार को दोपहर के भोजन में परोसी गई कद्दू की सब्जी ने वह कमाल कर दिखाया, जो शायद पाठ्यक्रम की किसी किताब में नहीं पढ़ाया जाता- यानी “पोषाहार खाओ, अस्पताल जाओ।“ खाना खाने के कुछ ही देर बाद बच्चों को उल्टी-दस्त और चक्कर आने लगे, और देखते-ही-देखते बीमार बच्चों की संख्या बढ़कर 31 पहुंच गई। “स्कूल ठीक करो” आंदोलन वाले भाई-बहनों से एक विनती है। आप इमारत की छत ठीक कर रहे हो, दीवारें पेंट करवा रहे हो, स्मार्ट क्लासरूम की बात कर रहे हो-बहुत अच्छा। लेकिन जब बच्चा क्लास में बैठने से पहले ही मिड-डे मील खाकर बेहोश हो जाए, तो स्मार्ट बोर्ड किस काम का? जब बच्चा शौचालय में जाने के बजाय अस्पताल के बेड पर पड़ा हो, तो साफ-सुथरे टॉयलेट का नारा किसके लिए? यह आंदोलन सिर्फ दीवारों और बेंचों तक सीमित न रहे। थोड़ा “किचन” की तरफ भी देख लो। क्योंकि अगर किचन ठीक नहीं हुआ, तो बच्चा स्कूल ठीक होने तक जिंदा ही नहीं रहेगा। और अगर बच्चा ही नहीं रहेगा, तो आंदोलन किसके लिए चलेगा? गौर करने वाली बात यह है कि योजना का नाम भले ही “मिड-डे मील“ हो, पर असल मकसद जैसे धीरे-धीरे बदलकर “मिड-डे मेडिकल कैंप“ हो गया हो। कद्दू जैसी साधारण सब्जी भी जब बच्चों को अस्पताल पहुंचा दे, तो सवाल यह उठता है कि रसोई की सफाई, सामग्री की गुणवत्ता और भंडारण व्यवस्था पर निगरानी रखने वाला महकमा आखिर करता क्या है-शायद बस अगली घटना का इंतज़ार। चिकित्सकों ने बच्चों का इलाज शुरू कर दिया है और हालत को लेकर राहत की खबरें भी हैं, लेकिन असली “इलाज“ तो उस व्यवस्था का होना बाकी है, जो हर कुछ हफ्तों में किसी न किसी स्कूल से यही कहानी दोहराती है-बस सब्जी और स्कूल का नाम बदल जाता है।
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